हिंदी-उर्दू बोलने वाले दुनिया के 8 देश: यात्रा, संस्कृति और भाषाई जुड़ाव
दुनिया में हिंदी भाषा की पहुंच भारत से कहीं आगे है। टाइम्स ऑफ इंडिया के एक लेख के अनुसार, ऐसे 8 देश हैं जहां हिंदी आमतौर पर बोली जाती है, जो यात्रा प्रेमियों के लिए आकर्षक गंतव्य हैं। इन देशों में हिंदी बोलने वाले लाखों लोग हैं, जो सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देते हैं। इस ब्लॉग में हम इन देशों पर चर्चा करेंगे, उनकी विशेषताओं और हिंदी की स्थिति पर। साथ ही, खाड़ी देशों में हिंदी-उर्दू बोलने वालों की बहुलता पर बात करेंगे, जहां अरबी मूल भाषा होने के बावजूद हिंदी-उर्दू का बोलबाला है। हम स्पष्ट करेंगे कि हिंदी और उर्दू एक ही भाषा हैं, सिर्फ लिपि में अंतर है—उर्दू फारसी लिपि में और हिंदी देवनागरी में। भारत के विभाजन से पहले उर्दू भारतीयों (हिंदू, मुस्लिम, सिख) की प्रमुख साझा भाषा थी। अंत में, हिंदी-प्रधान क्षेत्रों में उर्दू के भविष्य, उसके पतन के जिम्मेदारों और उसके अस्तित्व के उपायों पर विचार करेंगे।

हिंदी बोलने वाले प्रमुख देश
- नेपाल: दुनिया में भारत के बाद सबसे अधिक हिंदी बोलने वालों की संख्या वाला देश। यहां लगभग 80 लाख लोग हिंदी बोल सकते हैं, हालांकि मात्र 80,000 इसे अपनी पहली भाषा मानते हैं। हिंदी को आधिकारिक दर्जा नहीं है, लेकिन 2016 में इसे मान्यता देने पर चर्चा हुई थी, क्योंकि 80% आबादी इसे समझती है। भारत से सांस्कृतिक संबंध, खुली सीमा और भारतीय टीवी, फिल्मों की लोकप्रियता से हिंदी मजबूत है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका: दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी हिंदी बोलने वाली आबादी। यहां 6.49 लाख लोग हिंदी बोलते हैं, जो अमेरिका में 11वीं सबसे बोली जाने वाली विदेशी भाषा है। घरों और समुदायों में हिंदी, जबकि अंग्रेजी आधिकारिक जीवन में। अधिकांश भारतीय प्रवासी हैं, और दूसरी पीढ़ी अंग्रेजी पसंद करती है।
- मॉरीशस: यहां हिंदी से गहरा सांस्कृतिक जुड़ाव है, जहां 4.5 लाख लोग इसे बोलते हैं। संविधान में कोई आधिकारिक भाषा नहीं, लेकिन अंग्रेजी और फ्रेंच का उपयोग होता है।
- फिजी: फिजी हिंदी नामक विविधता यहां 3.8 लाख लोग बोलते हैं। यह उपनिवेश काल में भारतीय मजदूरों से विकसित हुई। इंडो-फिजियन पहचान का हिस्सा, घर, मीडिया, धार्मिक गतिविधियों में उपयोग।
- दक्षिण अफ्रीका: यहां 2.5 लाख लोग हिंदी बोलते हैं, मुख्यतः भारतीय समुदाय में। 19वीं सदी से भारतीय यहां हैं।
- सूरीनाम: 1.5 लाख लोग हिंदी बोलते हैं, विशेष रूप से इंडो-सूरीनामी (भारतीय मूल के लोग)। सरनामी हिंदी नामक क्षेत्रीय विविधता। 1873 से डच उपनिवेश काल में शुरू, सांस्कृतिक पहचान संरक्षण में महत्वपूर्ण।
- युगांडा: 1 लाख लोग हिंदी बोलते हैं, मुख्यतः भारतीय मूल के समुदाय में। घर, धार्मिक और सामुदायिक स्थलों में उपयोग।
- यूनाइटेड किंगडम: यहां 45,800 हिंदी बोलने वाले हैं। ब्रिटिश भारतीय समुदाय के कारण।
ये देश हिंदी की वैश्विक पहुंच दिखाते हैं, जहां यात्रा के दौरान हिंदी बोलकर आसानी से जुड़ा जा सकता है।
खाड़ी देशों में हिंदी-उर्दू की बहुलता
खाड़ी देश जैसे संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत, ओमान और कतर में अरबी मूल भाषा है, लेकिन यहां हिंदी-उर्दू बोलने वालों की बड़ी संख्या है, मुख्यतः भारतीय और पाकिस्तानी प्रवासियों के कारण। यूएई में 1.13 लाख उर्दू बोलने वाले हैं, जो आबादी का 1.2% हैं। कुल मिलाकर, खाड़ी में हिंदी-उर्दू बोलने वाले लाखों हैं, क्योंकि हिंदुस्तानी (हिंदी-उर्दू) यहां बोली जाती है। दुबई में उर्दू पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा होने से लोकप्रिय है। यह भाषाई विविधता खाड़ी को भारतीयों के लिए आकर्षक बनाती है।
हिंदी और उर्दू: एक ही भाषा, अलग लिपियां
हिंदी और उर्दू एक ही भाषा हैं, जिन्हें हिंदुस्तानी कहा जाता है। बोलचाल में वे पूर्णतः समझने योग्य हैं, लेकिन हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है (संस्कृत से व्युत्पन्न), जबकि उर्दू फारसी-अरबी लिपि (नस्तालीक) में। व्याकरण और मूल शब्दावली समान है, अंतर सिर्फ कुछ संस्कृत (हिंदी में) और फारसी-अरबी (उर्दू में) शब्दों का है। यह समानता खाड़ी में उपयोगी है, जहां हिंदी-उर्दू एक पुल का काम करती है।
विभाजन से पहले उर्दू: भारतीयों की साझा भाषा
1947 के विभाजन से पहले उर्दू उत्तरी भारत में प्रमुख भाषा थी, जो हिंदू, मुस्लिम और सिखों द्वारा बोली और लिखी जाती थी। ब्रिटिश काल में उर्दू अंग्रेजी के साथ उत्तरी भारत की आधिकारिक भाषा थी। यह हिंदुस्तानी के रूप में जानी जाती थी, और मुस्लिम लीग ने इसे राष्ट्रीय एकता का प्रतीक माना। विभाजन के बाद पाकिस्तान ने उर्दू को राष्ट्रीय भाषा बनाया, जबकि भारत में हिंदी प्रमुख हुई।
हिंदी-प्रधान क्षेत्रों में उर्दू का भविष्य
भारत में उर्दू का भविष्य चुनौतीपूर्ण है, लेकिन आशावादी भी। संस्थागत समर्थन की कमी से यह कमजोर हो रही है, लेकिन साहित्य, बॉलीवुड और कविता में जीवित है। गुलजार जैसे कवि कहते हैं कि उर्दू भारतीय है और जीवित रहेगी। हालांकि, हिंदू राष्ट्रवाद से जुड़ी धारणा से चुनौतियां हैं।
उर्दू के पतन के जिम्मेदार
उर्दू के पतन के मुख्य कारण: विभाजन के बाद सांप्रदायिकता, जहां इसे मुस्लिम भाषा माना गया; शिक्षा नीतियां जो हिंदी को बढ़ावा देती हैं; प्रवास और पुनर्वास; ब्रिटिश नीतियां जो पहले फारसी को हटाकर उर्दू को लाईं लेकिन बाद में हिंदी को प्रोत्साहन; और गर्व की कमी।
उर्दू का अस्तित्व कैसे सुनिश्चित हो?
उर्दू को बचाने के लिए: शिक्षा में शामिल करें, जनगणना में उर्दू घोषित करें, डिजिटल सामग्री (ऐप्स, वीडियो) बनाएं, साहित्य को बढ़ावा दें, और घरों में सिखाएं। अभियान और सरकारी समर्थन जरूरी हैं।
निष्कर्ष
ये देश हिंदी की वैश्विकता दिखाते हैं, जबकि हिंदी-उर्दू की समानता हमें एकता की याद दिलाती है। उर्दू को बचाना हमारी जिम्मेदारी है, ताकि यह विरासत जीवित रहे।


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